सड़क से चार्ज होती है यह इलेक्ट्रिक बस और भरती है फर्राटा
इस समय दुनिया भर में इंधन के उंचे होते कीमत और उनके प्रयोग से बढ़ने वाले प्रदूषण को देखते हुये हर देश चिंतित है और लगभग हर कोई इस समस्या के समाधान के लिये कुछ नये तकनीकी को विकसीत करने में लगा हुआ है। इसी क्रम में दक्षिण कोरिया के द कोरिया एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (KAIST) ने एक बेहद ही शानदार बस का निर्माण किया है।
यह एक सामान्य इलेक्ट्रिक बस की ही तरह है, और साधारणत: ही यह बस सड़क पर चलेगी लेकिन इसमें खास बात यह होगी कि, इस बस की बैटरी चार्ज करने के लिये किसी जगह पर रुकने का इंतजार नहीं करना है। बल्कि इस बस के लिये एक खास तरह की सड़क का निर्माण किया गया है, जो कि इस इलेक्ट्रिक बस को चार्ज करती रहती है। तो आइये तस्वीरों के माध्यम से इस बारें के बारें में जानते हैं।

सड़क से चार्ज होती है यह बस
आपको बता दें कि, इस योजना के तहत फिलहाल 12 किलोमीटर तक के रोड़ का निर्माण किया गया है और इस सड़क पर दो वॉयरलेस चार्जिंग बसों को चलाया जा रहा है।

भविष्य में और बसों को किया जायेगा शामिल
द कोरिया एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2015 तक इस योजना को और भी विस्ता दिया जायेगा और लगभग 10 अन्य बसों को शामिल किया जायेगा।

यातायात को मिलेगा बल
इस तकनीकी के प्रयोग से न केवल इंधन के खपत पर रोक लगाई जा सकेगी बल्कि इससे यातायात व्यवस्था को भी काफी बल मिलेगा। इस योजना को फिलहाल एक प्रयोग के तौर पर चलाया जा रहा है। वहीं जानकरों का मानना है कि यह एक महंगी योजना है, जो आम जगहों पर आसानी से संभव नहीं है।
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इस प्रकार कार्य करेगी यह तकनीकी
गौरतलब हो कि, सड़क पर इस तकनीक का प्रयोग किया गया है। इसमें बस के निचले हिस्से पर एक वैज्ञानिक उपकरण का प्रयोग किया गया है जो शेप्ड मैग्नेटिक फील्ड इस रीजोनेंस तकनीक का इस्तेमाल करके चार्ज हो जाता है। सड़क के नीचे बिछी बिजली की तारों को विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो उपकरण के अंदर लगी एक कुंडली में जमा होता है और फिर इसे बिजली में बदला जाता है. इसे चार्ज होने वाले उपकरण को सतह से 17 सेंटीमीटर ऊपर रखा जा सकता है।

पूरी सड़क को खोदने की नहीं है जरूरत
इतना ही नहीं, सड़क पर इस तकनीकी के प्रयोग के लिये जो पावर स्ट्रिप लगाये जायेंगे वो सड़क के पांच से लेकर 15 प्रतिशत हिस्से में ही स्थापित किये जायेंगे। इससे यह फायदा होगा कि, इस तकनीकी के प्रयोग के लिये पूरी सड़क को खोदने की कोई ज़रूरत नहीं है।
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