100cc बाइक में E85 फ्यूल डलवाना पड़ सकता है भारी; माइलेज और खर्च का चौंकाने वाला सच
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही रिपोर्ट्स की मानें तो 100cc की कम्यूटर बाइक्स के लिए E85 फ्यूल काफी महंगा सौदा साबित हो रहा है। हालांकि इथेनॉल का मकसद प्रदूषण कम करना है, लेकिन शुरुआती फील्ड टेस्ट के नतीजे चौंकाने वाले हैं। स्प्लेंडर+ जैसी बजट बाइक्स में E85 का इस्तेमाल आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है। अब राइडर्स यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या पर्यावरण बचाने के लिए रोजाना का इतना ज्यादा खर्च उठाना सही है?
दरअसल, स्टैंडर्ड पेट्रोल के मुकाबले इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी कम होती है। फ्लेक्स-फ्यूल इंजन E85 ब्लेंड पर चलने के दौरान करीब 30 प्रतिशत ज्यादा ईंधन की खपत करते हैं। भले ही पंप पर इसकी कीमत कम नजर आए, लेकिन माइलेज में आने वाली भारी गिरावट शुरुआती बचत को पूरी तरह खत्म कर देती है। ऑफिस जाने वाले आम लोगों के लिए अब प्रति किलोमीटर का खर्च पहले से ज्यादा बैठ रहा है।

| फ्यूल का प्रकार | औसत कीमत | अनुमानित माइलेज |
|---|---|---|
| पेट्रोल (E20) | Rs 104 | 68 kmpl |
| E85 फ्लेक्स-फ्यूल | Rs 82 | 46 kmpl |
E85 का खर्च और इंजन की सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं
आपको हाई इथेनॉल ब्लेंड का इस्तेमाल सिर्फ डेडिकेटेड फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स (FFV) में ही करना चाहिए। साधारण इंजन E85 में मौजूद अल्कोहल की अधिक मात्रा और उससे होने वाले नुकसान को नहीं झेल सकते। पुरानी पेट्रोल बाइक्स में इसे डालने से इंजन की सील खराब हो सकती है और आपकी वारंटी भी तुरंत खत्म हो जाएगी। इतना ही नहीं, गलत फ्यूल के इस्तेमाल से इंजन में हुई खराबी को इंश्योरेंस कंपनियां भी कवर नहीं करेंगी।
फिलहाल E85 फ्यूल की उपलब्धता भी बड़ी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMC) के चुनिंदा आउटलेट्स तक ही सीमित है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में तो फिर भी कुछ पंप दिख रहे हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसकी पहुंच बहुत कम है। फ्लेक्स-फ्यूल बाइक से लंबी ट्रिप पर निकलने से पहले फ्यूल रिटेलर्स के ऑफिशियल ऐप जरूर चेक कर लें। इससे आप बीच रास्ते में बिना फ्यूल के फंसने से बच जाएंगे और इंजन की परफॉर्मेंस भी बनी रहेगी।
खरीदारों को अभी पेट्रोल और इथेनॉल की कीमतों में सही तालमेल बैठने का इंतजार करना चाहिए। जब तक E85 के दाम काफी कम नहीं होते, तब तक आम लोगों के लिए स्टैंडर्ड पेट्रोल ही सबसे किफायती विकल्प है। डिलीवरी फ्लीट चलाने वाले मालिकों को भी अपनी पूरी टीम को फ्लेक्स-फ्यूल पर शिफ्ट करने से पहले माइलेज के डेटा को बारीकी से समझना होगा। फिलहाल सारा फोकस इस बात पर है कि कंपनियां भविष्य के ग्रीन मॉडल्स की एफिशिएंसी में कैसे सुधार करती हैं।


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