#WeGo के संग तमिलनाडु में पोंगल सेलीब्रेट करने के बाद
दिन भर की हलचल और त्योहार के उत्साह के साथ अब हम तमिलनाडु की हवा में रम गए। अब वक्त था प्रसिद्ध तंजोर पेंटिंग्स और बेहतरीन मंदिरों को देखने का जो इस राज्य को सबसे अलग बनाती हैं। पोंगल के मौके पर इस शहर ने हमें खास आकर्षित किया।

पोंगल चार दिन मनाया जाता है। पहली पोंगल को भोगी पोंगल कहते हैं जो देवराज इन्द्र को समर्पित हैं। इसे भोगी पोंगल इसलिए कहते हैं क्योंकि देवराज इन्द्र भोग विलास में मस्त रहनेवाले देवता माने जाते हैं।

इस दिन संध्या समय में लोग अपने अपने घर से पुराने वस्त्र कूड़े आदि लाकर एक जगह इकट्ठा करते हैं और उसे जलाते हैं। यह ईश्वर के प्रति सम्मान एवं बुराईयों के अंत की भावना को दर्शाता है। इसअग्नि के इर्द गिर्द युवा रात भर भोगी कोट्टम बजाते हैं जो भैस की सिंग काबना एक प्रकार का ढ़ोल होता है। यह याद दिलाता है कि स्कूटर्स हालिया कुछ वर्षों में कैसे नए रंग रूप में सामने आया है। एक तरफ इंजन जिसमें चालक को अपना वजन संतुलित करना पड़ता था, अब गुजरा जमाना हो चुका है और वीगो की बॉडी बैलेंस टेक्नोलॉजी एक नया रूप है।

बाकी के दिन पोंगल के मुख्य दिन होते हैं। इन दिनों पोंगल नामक एक विशेष प्रकार की खीर बनाई जाती है जो मिट्टी के बर्तन में नये धान से तैयार चावल मूंग दाल और गुड से बनती है। पोंगल तैयार होने के बाद सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है और उन्हें प्रसाद रूप में यह पोंगल व गन्ना अर्पण किया जाता है और फसल देने के लिए कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

एक दिन गन्ने का भी होता है। यह लगभग सभी को उनके बचपन के दिन याद दिलाता है। जैसे पापा का स्कूटर पर खेत से गन्ना लादकर घर वापस लौटना। यह उत्साह आज भी वैसा ही है जबकि स्कूटर नए रंग रूप में बदल चुका है।

पारंपरिक खाना खाने के बाद अब समय आया कोलम की कला को करीब से जानने का। यह एक लोक कला है जो शुभ अवसरों पर घर के फ़र्श को सजाने के लिए की जाती है। कोलम बनाने के लिए सूखे चावल के आटे को अँगूठे व तर्जनी के बीच रखकर एक निश्चित आकार में गिराया जाता है। इस प्रकार धरती पर सुंदर नमूना बन जाता है। कभी कभी इस सजावट में फूलों का प्रयोग किया जाता है।

मवेशी धन का एक स्रोत होते हैं। डेयरी प्रोडक्ट, खाद और बेशक खेती के काम में आते हैं। पोंगल के तीसरे दिन मवेशियों की पूजा होती है। इस दिन किसान अपने बैलों को स्नान कराते हैं उनके सिंगों में तेल लगाते हैं एवं अन्य प्रकार से बैलों को सजाते हैं। बैलों को सजाने के बाद उनकी पूजा की जाती है। बैल के साथ ही इस दिन गाय और बछड़ों की भी पूजा की जाती है।

चार दिनों के इस त्यौहार के अंतिम दिन कन्नूम पोंगल मनाया जाता है जिसे तिरूवल्लूर के नाम से भी लोग पुकारते हैं। इस दिन घर को सजाया जाता है। आम के पलल्व और नारियल के पत्ते से दरवाजे पर तोरण बनाया जाता है। महिलाएं इस दिन घर के मुख्य द्वारा पर कोलम यानी रंगोली बनाती हैं। इस दिन पोंगल बहुत ही धूम धाम के साथ मनाया जाता है । लोग नये वस्त्र पहनते है और दूसरे के यहां पोंगल और मिठाई वयना के तौर पर भेजते हैं।

इस पोंगल के दिन ही बैलों की लड़ाई होती है जो काफी प्रसिद्ध है। जिसे जल्लीकट्टू कहते हैं। जल्लीकट्टू तमिलनाडु का चार सौ वर्ष से भी पुराना पारंपरिक खेल है। इसमें 300-400 किलो के सांड़ों की सींगों में सिक्के या नोट फंसाकर रखे जाते हैं और फिर उन्हें भड़काकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है, ताकि लोग सींगों से पकड़कर उन्हें काबू में करें। कथित तौर पर पराक्रम से जुड़े इस खेल में विजेताओं को नकद इनाम वगैरह भी देने की परंपरा है। सांड़ों को भड़काने के लिए उन्हें शराब पिलाने से लेकर उनकी आंखों में मिर्च डाला जाता है और उनकी पूंछों को मरोड़ा तक जाता है, ताकि वे तेज दौड़ सकें। यह जानलेवा खेल मेला तमिलनाडु के मदुरै में लगता है।

जैसा की पोंगल का त्योहार समाप्त हो गया। यह ठीक वैसा ही था जैसा छुट्टियों के बाद बच्चों को एहसास होता है अब उन्हें स्कूल जाना पड़ेगा। जैसा भी हो लेकिन वीगो की सवारी बिल्कुल वैसी ही थी जैसे बच्चों की मस्ती।


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