विश्व बायो फ्यूल दिवस: वाहनों में इथेनॉल के इस्तेमाल के क्या हैं फायदे? जानें कैसे करेगा प्रदूषण को कम
देश में ईंधन की खपत लगातार बढ़ रही है। पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से प्रदूषण भी बढ़ रहा है। ऐसे में बायो फ्यूल यानी इथेनॉल पेट्रोल के मुकाबले कहीं कम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता है। दुनिया भर में कई देश बायो फ्यूल का उत्पादन बढ़ाने पर काम कर रहे हैं ताकि पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के साथ-साथ पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता को भी कम किया जा सके। भारत में भी बायो फ्यूल का उत्पादन बढ़ाने के लिए कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं।

आज विश्व बायो फ्यूल दिवस (World Biofuel Day) के अवसर हम आपको बताने जा रहे हैं कि बायो फ्यूल क्या है, यह क्यों परिवहन के लिए जरूरी हो सकता है और यह कैसे पर्यावण के संरक्षण में हमारा सहयोग कर सकता है। आइए जानते हैं...

कैसे तैयार होता है बायो फ्यूल?
बायो फ्यूल को तैयार करने के लिए कई तरह के जैविक उत्पादों का उपयोग किया जाता है। आमतौर पर बायो फ्यूल को तैयार करने के लिए मक्के, गन्ने और चावल की फसल का उपयोग किया जाता है। कई देशों में बायो फ्यूल (इथेनॉल) को तैयार करने के लिए जट्रोफा (Jatropha) का इस्तेमाल किया जाता है, जो एक तरह का पौधा है।

इन सभी जैविक उत्पादों को बायो फ्यूल बनाने वाली फैक्ट्री में कई चरणों में रासयनिक प्रोसेसिंग की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इन फैक्ट्रियों में अंतिम उत्पाद के तौर पर बायो फ्यूल निकलता है जिसकी कैलोरिफिक वैल्यू यानी ऊर्जा पैदा करने की क्षमता पेट्रोल से कम होती है लेकिन इनके जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है।

भारत में बिक रहा है ई20 ब्लेंड फ्यूल
ब्लेंड फ्यूल को फ्लेक्स फ्यूल भी कहा जाता है। फ्लेक्स फ्यूल पेट्रोल और इथेनॉल का मिश्रण होता है जिसे पेट्रोलियम कंपनियां तैयार करती हैं। एक लीटर ई20 (E20) फ्लेक्स फ्यूल में 80 प्रतिशत पेट्रोल और 20 प्रतिशत इथेनॉल होता है। भारत सरकार ने 2025 तक देश के सभी पेट्रोल स्टेशनों पर ई20 फ्लेक्स फ्यूल उपलब्ध करने का लक्ष्य रखा है।

बता दें कि पेट्रोलियम मंत्रालय ने E80 जैव ईंधन के उपयोग पर केंद्र सरकार के समक्ष अपनी सिफारिश पेश की थी। E80 फ्लेक्स फ्यूल में इथेनॉल की मात्रा 80 प्रतिशत जबकि पेट्रोल की मात्रा केवल 20 प्रतिशत ही होगी। कहा जा रहा है कि अगर यह नीति लागू होती है तो कि इससे पेट्रोल के लिए भारत की दूसरे देशों पर निर्भरता हम होगी।

बायो फ्यूल के ये हैं फायदे
बायो फ्यूल यानी इथेनॉल कई तरह से फायदेमंद है। अगर वाहन में बायो फ्यूल से तैयार किया गया फ्लेक्स फ्यूल इस्तेमाल किया जा रहा है तो इससे प्रदूषण में कमी की जा सकती है। फ्लेक्स फ्यूल जब वाहन के इंजन में जलता है तो यह कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन और अन्य खतरनाक गैसों के उत्सर्जन को कम करता है। उदाहरण के तौर पर, E20 फ्लेक्स फ्यूल मिश्रण कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन को दोपहिया वाहनों में लगभग 50 प्रतिशत और चार पहिया वाहनों में लगभग 30 प्रतिशत कम करता है।

साथ ही, यह मिश्रण समग्र रूप से ईंधन की लागत को कम करता है। इसके अलावा, जैव ईंधन के उपयोग से ब्रेक थर्मल एफिशिएंसी भी बढ़ जाती है। हालांकि, कैलोरिफिक वैल्यू होने के चलते बायोफ्यूल की खपत ज्यादा होती है।

बायो फ्यूल में कहाँ खड़ा है भारत?
वर्तमान में, भारतीय बाजार फ्लेक्स फ्यूल पर उत्पादों को चलाने में सफलता प्राप्त नहीं कर सका है। हालांकि, सरकारी एजेंसियों ने वर्ष 2025 तक जैव ईंधन के उपयोग पर जनादेश को लागू करने की पुष्टि की है। बजाज और टीवीएस जैसे चुनिंदा ब्रांड फ्लेक्स फ्यूल इंजन के विकास पर काम कर रहे हैं। वास्तव में, TVS ने 2019 में Apache 200 का एक नया मॉडल लॉन्च किया था, जो E100 या E80 फ्लेक्स फ्यूल पर चल सकता है। अफसोस की बात है कि इसे बहुत सारे खरीदार नहीं मिले क्योंकि फ्लेक्स फ्यूल की उपलब्धता अभी भी देश में पूरी तरह नहीं है।


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