सड़कों पर ही नहीं एक दिन देश के बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लेंगी गाड़ियां

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न्यूज की हेडलाइन आपको भले एक रूटिन की न्यूज की तरह लग रही हो, लेकिन अगर आप वास्तव में देश में बढ़ती ट्रैफिक समस्या के बारे में सोचने बैठेंगें और वर्तमान स्थितियों की समीक्षा करेंगें तो आपको बहुत भयावह तस्वीर नजर आएगी। बताया जा रहा है कि अगर वाहनों के बढ़ने की गति की यही रही तो एक दिन पूरी धरती पर वाहन ही वाहन होंगे?

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सड़कों पर ही नहीं एक दिन पूरे देश के बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लेंगी गाड़ियां

पूरी धरती पर वाहन के होने की बात यह हम कोई अपने से नहीं कह रहे हैं। बल्कि यह कई रिसर्च में भी सामने आ चुका है। कि अगर इसी तरह वाहन बढ़ते रहे तो धरती के एक बड़े भूभाग पर सिर्फ और सिर्फ वाहनों का कब्जा होगा।

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खैर, हम यहां पूरी धरती की बात नहीं करने जा रहे हैं और इसे केवल भारत पर केन्द्रित करते हुए बता दें कि इस स्थिति पर हाल ही में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने चिंता जताई और स्थिति को काफी भयावह कहा है। हालांकि उन्होंने इस समस्या को रखते हुए समाधान पर भी विस्तार से अपनी बात कही।

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केंद्रीय मंत्री ने हिंदी दैनिक के हवाले से कहा कि सड़क परिवहन की दशा सड़कें चौड़ी कर देने से नहीं बल्कि निजी वाहनों की संख्या कम करने से सुधरेगी। उन्होंने अपने मंत्रालय की एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि जिस तरह से वाहनों की संख्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए हर वर्ष सभी हाइवे पर एक अतिरिक्त लेन बनानी होगी।

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उन्होंने अतिरिक्त लेन की बात पर जानकारी देते हुए आगे कहा इन अतरिक्त लेन्स के निर्माण में ही करीब 50 हजार करोड़ रुपये खर्च हों जाएंगे, लेकिन इसके बाद भी जरूरी नहीं है कि इस समस्या का समाधान निकल ही जाए। क्योंकि समस्या हमें जितना दिखाई पड़ रही है। यह उससे कहीं ज्यादा है।

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अब मंत्री के इन्ही वक्तव्यों को लेकर स्थितियों की समीक्षा की जाए तो यह तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि गडकरी जो कह रहे हैं, वही इस देश की हकीकत है। आप बड़े शहरों में देखिए, खासकर महानगरों दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरू जैसे शहरों में सड़कों पर वाहनों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है।

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वाहनों की इस बढ़ोत्तरी का नतीजा यह निकल रहा है कि यहां की सड़कों पर वाहन न केवल रेंगते नजर आ रहे हैं बल्कि करोंडो़ लोगों को रोजाना ट्रैफिक जाम से उलझना पड़ता है। बड़े शहरों की सड़कों की बात तो आप छोड़ दीजिए छोटे-छोटे मोहल्लों में भी लोगों का चलना-फिरना मुश्किल होता जा रहा है।

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इसके पीछे वजह जो भी हो लेकिन यह वाहनों खंडों की बढती संख्या और रिहायशी इलाकों में पार्किंग के पर्याप्त बदइंतजामी तो दर्शाता ही है। सड़कों के बेहतर रखरखाव न होने, लोगों में सिविक सेंस के अभाव और नियमों के पालन में ढिलाई से आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। रोड-रेज की घटनाएं तो समान्य सी बात हो गई है।

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देश में दुर्घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े तो दिल दहलाने वाले हैं। पिछले साल सड़क हादसों में हर घंटे 16 लोग मारे गए। दिल्ली रोड पर होने वाली मौतों के मामले में सबसे आगे रही जबकि उत्तर प्रदेश सबसे घातक प्रांत रहा। देश में हर साल 1.5 से 2.5 लाख लोग दुर्घटना मारें जाते हैं।

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जबकि दूसरी ओर समाचार की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले साल बारह करोड़ से ज्यादा वाहन थे और वाहनों के पंजीकरण की वार्षिक वृद्धि दर 10 प्रतिशत है। अनुमान है कि 2050 तक देश की सड़कों पर 61.1 करोड़ वाहन होंगे जो विश्व में सर्वाधिक वाहन संख्या होगी, जो कि स्थिती की भयावहता को दर्शाता है।

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वैसे भी भारत के ज्यादातर शहरों और महानगरों का विकास बिना किसी योजना के हुआ है। उन्हें नई सामाजिक-आर्थिक विकास प्रक्रिया और जरूरतों के मुताबिक नहीं बसाया गया है। यहां गांवों-कस्बों से हाल के वर्षों में लगातार लोग आकर बसते रहे हैं और बेतरतीब ढ़ंग से वाहनों को खरीदते रहते हैं।

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भारत में कुछ इसी तरह की बातों के कारण एक मजबूत और सक्षम सार्वजनिक परिवहन तंत्र विकसित न तो विकसित हो पाया और न ही आगे इसमें कोई सुधार की गुंजाइश होती दिख रही है। वैसे तो हम इस समस्या को जनसंख्या से जोड़कर अपनी जिम्मेदार से मुंह मोड़ सकते हैं लेकिन आने वाले दिनों में स्थिति होगी उसकी कल्पना करना भी भय उत्पन्न करता है।

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ऑटो सेक्टर में दिनों दिन वाहनों के प्रोडक्शन और बिक्री में बढ़ोत्तरी भले हो रही है लेकिन अब यहह एक ऐसा सेक्टर बन गया है जिसकी जरूरत भी है लेकिन इतनी विशाल जनसंख्या की जरूरत सिस्टम पूरा करता नहीं रहा है।

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हमारे देश के हर भाग में सड़कों के चौड़ीकरण, फ्लाईओवर और मल्टीलेवल पार्किंग का निर्माण तो हुआ है, पर वाहनों की संख्या को देखते हुए ये तमाम उपाय अपर्याप्त हैं। सड़कों का निर्माण गांव और पिछड़े क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। लेकिन इससे सामाजिक मान्यता भी समस्या बढ़ने की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है।

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आज दिल्ली, लखनऊ, चेन्नई या देश का कोई बड़ा महानगर हो यहां अब बड़ी गाड़ियां रखना संपन्नता का प्रतीक माना जाने लगा है। इसलिए लोगों को अपनी गाड़ी छोड़कर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल के लिए कहना भी कठिन है। जबकि देश को सबसे ज्यादा इसी की जरूरत है। फिर भी कुछ सुधार हो ऐसी कोई संभावना नजर नहीं आ रही है।

Drivespark की राय

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खैर, सुधार की अगर कोई संभावना नहीं दिखती तो इसका अर्थ यह नहीं है कि सब कुछ ऐसे ही छोड़ दिया जाए। इसके लिए कुछ न कुछ लोगों को करने की आवश्यकता तो है ही। इसके लिए लोगों को अपना निजी वाहन को रखने को हतोत्साहित करना ही एकमात्र विकल्प बचता है। लोगों को भी समझाना होगा कि वाहन का हमारी हैसियत से कोई संबंध नहीं है।

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हां, सरकार की ओर से यह हो सकता है कि वह पहले मूलभूत संरचनाओं को मजबूत बनाए और गाड़ी खरीदने की प्रक्रिया को और कठिन बना दे। इसके अलावा पार्किंग के रेट बढ़ाने और पुराने वाहनों को एक समय के बाद चलन से बाहर करने जैसे तरीके अपनाने होंगे।

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सरकार को देश में एक सक्षम सार्वजनिक यातायात प्रणाली भी विकसित करनी होगी। तभी जाकर इस समस्या का समाधान निकल सकता है। वर्ना स्थिति तो इसी तरह की दिख रही है कि एक दिन पूरे देश के भूभाग पर सिर्फ और सिर्फ गाड़ियां होगी और उसकी शुरूआत भी हो चुकी है। सबको जल्द जागने की आवश्यकता है।

English summary
Union Minister Nitin Gadkari has expressed concern about the way the number of vehicles is increasing in India and has called them a burden on the country.
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