सड़क सुरक्षा को बनायें स्‍कूली पाठ्यक्रम का हिस्‍सा

By Saroj Malhotra

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की वैश्‍व‍िक सड़क सुरक्षा रिपोर्ट 2013 की रिपोर्ट भारतीयों के लिए चौंकाने वाली है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर बरस 2 लाख 31 हजार लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। असली आंकड़ा बहुत ज्‍यादा हो सकता है क्‍योंकि हमारे यहां दुर्घटनाओं का वैध डाटा ही मौजूद नहीं है। यदि हमने इन बिगड़ते हालातों के बारे में कुछ नहीं किया, तो दुर्घटनाओं की संख्‍या में लगातार होता इजाफा जल्‍द ही नियंत्रण से बाहर हो जाएगा। हम युद्ध स्‍तर की स्थिति तक पहुंच जाएंगे। तो, अभी से संदेश दिया जाना जरूरी है। लाइसेंस प्रणाली को बेहतर बनाने और सड़क कानूनों को गंभीरता से लागू करने के साथ ही वक्‍त आ गया है कि स्‍कूलों में सड़क सुरक्षा के विषय को शामिल किया जाए। दुनिया के कई मुल्‍कों में पहले से ही स्‍कूलों में इस तरह के विषय पढ़ाये जा रहे हैं।

एक बड़ी समस्‍या यह है कि आज की नयी पीढ़ी के पास सड़क सुरक्षा की पढ़ाई के लिए कोई विश्‍वसनीय प्रणाली उपलब्‍ध नहीं है। इसके स्‍थान पर वे पिछड़ी पीढ़ी से ही सड़क यातयात कानूनों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं, लेकिन अकसर उनकी अपनी जानकारी बुरी तरह अपर्याप्‍त और दोषपूर्ण होती है। वे स्‍वयं सड़क पर गलत परंपराओं का निर्वहन करते हैं। या फिर यही नयी पीढ़ी अपने 'अनुभवों' के आधार पर सीखती है। जैसे ही कोई व्‍यक्ति सड़क पर वाहन लेकर उतरता है, वह इस प्रक्रिया का हिस्‍सा बन जाता है। कोई भी न तो निजी क्षेत्र और न ही कोई सरकारी संस्‍थान इस चिंताजनक परिस्थिति को सुधारने के लिए गंभीरता से कुछ करता नजर आ रहा है।

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सड़क सुरक्षा के प्रति हमारी लापरवाही को स्‍कूलों के स्‍तर पर रोके जाने की जरूरत है, न कि इस कहानी का अंत अस्‍पताल में आकर होना चाहिए। क्‍योंकि, अगर हमने अभी बदलाव करने नहीं शुरू किये, तो काफी देर हो जाएगी। हर गुजरते दिन के साथ भारत में कारों और मोटरसाइकिलों की रफ्तार लगातार तेज होती जा रही है। लेकिन सड़क सुरक्षा को लेकर हमारा व्‍यवहार अब भी बहुत पिछड़ा हुआ है। विकसित देशों में सड़क सुरक्षा की शिक्षा किसी न किसी तरह से स्‍कूल में ही शुरू कर दी जाती है। तो जब तक बच्‍चा स्‍नातक होता है, उसे सड़क और यातायात सुरक्षा के बारे में अच्‍छी जानकारी हो जाती है। वे सड़क कानूनों का बेहतर निर्वाह कर पाते हैं। यह सड़क दुर्घटनाओं की संख्‍या में भारी कमी होने से जाहिर भी हो जाता है। उदाहरण के लिए जापान में वर्ष 2012 में 4411 सड़क दुर्घटनायें हुईं।

हालांकि जापान ने सड़क सुरक्षा को सीधे तौर पर स्‍कूली पाठ्यक्रमों का हिस्‍सा नहीं बनाया है, लेकिन इसके बावजूद जापानी सरकार बच्‍चों को सड़क सुरक्षा सिखाने के लिए नायाब तरीका आजमाती है। यहां खासतौर पर बच्‍चों के लिए बनाये गए ड्राइविंग स्‍कूल हैं। जहां सड़क कानून और सुरक्षा के बारे में मजेदार और रोचक अंदाज में सिखाया जाता है। यह तरीका बच्‍चों को बहुत मदद करता है। और जब वे बड़े होकर गाड़ी चलाने लगते हैं, तो उससे पहले ही उन्‍हें काफी कानूनों की जानकारी होती है। बच्‍चों को खासतौर पर बनायी गयी गो-कार्ट चलाना सिखाया जाता है। बड़े बच्‍चों के लिए मोटरवाहन होते हैं वहीं छोटे बच्‍चे इलेक्‍ट्रिक से चलने वाली गाडि़यां चलाते हैं। ये गाडि़यां वास्‍तविक खासतौर पर बनाये गए ट्रेक पर चलाई जाती हैं, जिन पर सड़क जैसी ड्राइविंग परिस्थितियां मौजूद होती हैं। ये कारों में इंडी‍केटर, रियर व्‍यू मिरर और अन्‍य खूबियां भी होती हैं। इनके जरिये बच्‍चों को सड़क सुरक्षा का पाठ पढ़ाया जाता है। इसकी खास बात यह है कि कोर्स पूरा करने के बाद उन बच्‍चों को 'चिल्‍ड्रन लाइसेंस' भी दिया जाता है। इसी तरह के स्‍कूल भारत में भी बनाये जा सकते हैं। इसके साथ ही क्‍लासरूम में थ्‍योरी भी पढ़ाई जा सकती है।

फ्रांस और स्‍पेन के राष्‍ट्रीय पाठ्यक्रम में प्राथमिक और सेकेण्‍डरी स्‍तर की शिक्षा में सड़क सुरक्षा की पढ़ाई को अनिवार्य तौर पर शामिल किया गया है। फ्रांस में 12 वर्ष की आयु के सेकेण्‍डरी छात्रों के लिए सड़क सुरक्षा सर्टिफिकेट (एएसएसआर) को अनिवार्य तौर पर पढ़ाया जाता है। इसमें पैदल सड़क पार करने और दुपहिया सुरक्षा संबंधी शिक्षा दी जाती है। जब कोई बच्‍चा 16 बरस का हो जाता है, तब उन्‍हें एएसएसआर का एक अन्‍य कोर्स भी पास करना होता है। उस कोर्स में सड़क सुरक्षा अधिक व्‍यापक स्‍तर पर कवर किया जाता है।

स्‍पेन में सड़क सुरक्षा को भी स्‍कूली पाठ्यक्रम का हिस्‍सा बनाया जाता है। कुछ उत्‍तरी यूरोपीय देशों ने भी सड़क सुरक्षा को स्‍कूली पढ़ाई का हिस्‍सा बनाया हुआ है। ऊपर हमने जितने भी देशों का जिक्र किया, उन सबमें एक बात सामान्‍य है कि वे सड़क सुरक्षा को गंभीरता से लेते हैं। वे सड़क सुरक्षा को वैसे ही सिखाते हैं, जैसे उसे सिखाया जाना चाहिए। और यह अंतर जिंदगी और मौत का है।

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तो, आखिर हम क्‍यों नहीं अपने बच्‍चों को सड़क सुरक्षा की अहमियत सिखा सकते? इसका जवाब बहुत आसान है। हम ऐसा इसलिए नहीं कर पाते, क्‍योंकि हमने अभी तक इसके महत्‍व को पहचाना नहीं है। जब हमने अपना लाइसेंस बनवाया था तब किसी ने हमें नहीं समझाया। लेकिन, उस समय और आज के हालात में अंतर है। तब सड़कों पर मारुति 800, फिएट और अम्‍बेस्‍डर जैसी कारें चला करतीं थीं। इसके साथ ही उस समय सड़कों की हालत भी अलग हुआ करतीं थीं। भारत में मोटर क्रांति के बाद तो सड़कों की हालत काफी बदल गयी है।

अगर, हमारे देश में सड़क सुरक्षा की पढ़ाई को अमल में लाया जाता है, तो इसे सही तरीके से लाया जाना भी जरूरी है। पर्यावरण विज्ञान के जानकार द्वारा बच्‍चों को सड़क सुरक्षा पढ़ाए जाने का कोई औचित्‍य नहीं। यानी ऐसा टीचर अनुपयोगी साबित होगा जिसे मौजूदा सड़क कानूनों और सुरक्षा मापदण्‍डों की सही जानकारी नहीं है। सरकार इसके लिए विदेशी विशेषज्ञों की मदद से टीचर्स को ट्रेनिंग दिला सकती है। इससे हमारे टीचर स्‍वयं सड़क सुरक्षा को गंभीरता से लेंगे। वे इसके महत्‍व को समझेंगे और साथ ही यह भी जानेंगे कि आखिर क्‍यों ये दुनिया के अन्‍य देशों में इतनी अच्‍छी तरह से काम कर रही है। ऑस्‍ट्रेलिया की रोड सेफ्टी एजुकेशन जैसी कामयाब संस्‍था को भी भारत में बुलाकर टीचर्स में इस विषय को लेकर जागरुकता पैदा की जा सकती है। आखिर इससे पहले कि हमारे टीचर्स बच्‍चों को सड़क सुरक्षा संबंधी सही और उपयोगी जानकारी दें, उन्‍हें स्‍वयं इसके बारे में पर्याप्‍त जानकारी होनी चाहिए।

हम इस बात से सहमत हैं कि सिर्फ सड़क सुरक्षा कानूनों से बुरी तरह बिगड़ चुकी यह समस्‍या समाप्‍त नहीं होने वाली। लेकिन, कम से कम शुरुआत तो की ही जा सकती है। भारत को इस विषय पर लेकर व्‍यापक स्‍तर पर जागरुकता फैलाने की जरूरत है। आखिर कब तक हम सड़क दुर्घटना में किसी अपने की जान गंवाने की खबर सुनते रहेंगे। और अपने देश की मानसिकता बदलने के लिए कुछ नहीं करेंगे। आखिर अब ज्‍यादातर लोग सीट बेल्‍ट पहनते हैं। यह बेहतरी का एक संकेत है। आइये बेहतरी की इस दिशा में और आगे बढ़ते हैं। और शुरुआत से ही जागरुकता का बीजारोपण करते हैं।

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Article Published On: Friday, May 30, 2014, 13:43 [IST]
English summary
Road safety education should be part of National School Curriculum. Road safety education must target children to improve India's road accident fatalities.
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