सिर्फ दो घंटे का आराम और 1,200 किलोमीटर साइकिल का सफर, 15 साल की बेटी ने पिता के लिए किया कुछ ऐसा
देश भर में लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूर अपने घर जा रहे है, ऐसे समय में सरकार की नाकामी सामने आ रही है जिस वजह से लोगों को अपने से साधन जुटाकर घर जाना पड़ रहा है। हाल ही में एक बिहार की लड़की ने अपने पिता को घर ले जाने 1200 किलोमीटर साइकिल का सफर किया है।

देश भर में सार्वजनिक परिवहन बंद रखे गये है तथा सिर्फ मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए स्पेशल ट्रेन व बस चलाए जा रहे है लेकिन यह सुविधा सभी को नहीं मिल पा रही है। ऐसे में गरीब प्रवासी मजदूर अपने से ही जुगाड़ करके घरों की ओर निकल पड़े है।

इसी राह पर चलते हुए एक 15 साल की बिहार की रहने वाली लड़की ज्योति ने अपने बीमार को दिल्ली से दरभंगा ले जाने की ठानी। कोविड-19 की वजह से उनके पिता की रोजी रोटी छीन गयी है, उनके पैर पर चोट आई है, कई मील पैदल चलने के बाद बाकी का सफर उनकी बेटी ने साइकिल में पूरा करने फैसला किया।
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इस पिता-पुत्री की जोड़ी ने अपना सफर 10 मई को शुरू किया था। पहले तो उन्होंने बस से ही घर जाने की सोची लेकिन जब वह बस अड्डे पहुंचे तो उनके पास बस का किराया देने के लिए 6000 रुपये नहीं थे, ऐसे में उन्होंने पैदल सफर किया और 16 मई को अपने गांव पहुंच गये।

ज्योति ने जुगाड़ करके 500 रुपये की साइकिल की खरीदी तथा अपना सफर शुरू किया। उनके पास सिर्फ 100 रुपये ही बचे थे जो कि उन्होंने बाकी के सफर के लिए बचा कर रखा था। इसके बाद वे हाईवे पर साइकिल चलाती रही तथा दिन-रात सफर करती रही।

ज्योति ने बताया कि "मुझे रात में भी साइकिल चलाने में कोई डर नहीं लगा क्योकि हाईवे पर सैकड़ो मजदूर चल रहे थे। सिर्फ खतरा था तो रोड हादसे का, भाग्यवश हमें उस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा।" इस सफर के दौरान उन्होंने सिर्फ 2 - 3 घंटे का ही आराम किया।

उन्होंने रात में पेट्रोल पंप जैसी जगह पर रुककर 2-3 घंटे आराम किया तथा उसके बाद फिर से निकल पड़ते थे। हालांकि रास्ते पर उन्होंने राहत कैंप पर रुककर व रास्ते में बांटने वाले खाने को ही खाया। उनके इस सफर के बारे में जानकार गांववाले भी चकित हो गये थे।

अब कई लोग इस लड़की की मदद के लिए आगे आगे है, हाल ही में साइकिलिंग फेडरेशन ने इसकी मदद की बात कही है। इसी तरह कई कहानियां सामने आई है जिसमें मां अपने बच्चे को वापस लाने के लिए स्कूटर में ही लंबी सफर कर रही है।

लेकिन यह पहला मामला था जिसमें पिता की बेटी ने मदद की है तथा दिल्ली से दरभंगा का दर्दनाक सफर साइकिल चलाकर तय किया है। राज्य में जाने के लिए अभी भी कई प्रवासी मजदूर तड़प रहे है लेकिन उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है।


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