दिल्ली में कार सस्ती, मुंबई में महंगी: शहर बदलते ही क्यों बदल जाती है गाड़ी की कीमत?
भारत में जब कोई व्यक्ति कार खरीदने की योजना बनाता है, तो अक्सर उसे एक बात हैरान कर देती है कि एक ही मॉडल की कार अलग-अलग शहरों में अलग कीमत पर क्यों मिलती है। कई लोग इंटरनेट पर कीमत देखते हैं या किसी दूसरे शहर के शोरूम से तुलना करते हैं तो उन्हें कीमत में बड़ा अंतर दिखाई देता है। खासकर पहली बार कार खरीदने वालों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि जब कार वही है, इंजन वही है और फीचर्स भी वही हैं, तो कीमत क्यों बदल जाती है। असल में कार की कीमत सिर्फ कंपनी द्वारा तय की गई कीमत नहीं होती, बल्कि इसमें कई सरकारी टैक्स और स्थानीय शुल्क भी शामिल होते हैं। यही वजह है कि अंतिम कीमत शहर या राज्य के हिसाब से बदल जाती है।

एक्स-शोरूम और ऑन-रोड कीमत का अंतर
कार की कीमत को समझने के लिए सबसे पहले एक्स-शोरूम और ऑन-रोड कीमत के अंतर को समझना जरूरी है। किसी भी कार की शुरुआत एक्स-शोरूम कीमत से होती है। यह कीमत कंपनी तय करती है और आमतौर पर देश के ज्यादातर शहरों में लगभग समान रहती है। लेकिन ग्राहक को कार खरीदते समय केवल एक्स-शोरूम कीमत ही नहीं देनी होती। इसके अलावा रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन फीस, इंश्योरेंस और कई मामलों में Tax Collected at Source (TCS) जैसे अतिरिक्त चार्ज भी जोड़ दिए जाते हैं। इन सभी खर्चों को जोड़कर जो अंतिम कीमत बनती है, उसे ऑन-रोड कीमत कहा जाता है। क्योंकि ये सभी चार्ज अलग-अलग राज्यों और शहरों में अलग होते हैं, इसलिए एक ही कार की ऑन-रोड कीमत हर जगह अलग दिखाई देती है।
रोड टैक्स क्यों बनता है सबसे बड़ा कारण
कार की कीमत में अंतर आने का सबसे बड़ा कारण रोड टैक्स होता है। भारत में रोड टैक्स केंद्र सरकार नहीं बल्कि राज्य सरकारें तय करती हैं। इसलिए हर राज्य में रोड टैक्स की दर अलग होती है। कुछ राज्यों में कार की कीमत का एक तय प्रतिशत रोड टैक्स के रूप में लिया जाता है, जबकि कुछ राज्यों में स्लैब सिस्टम लागू होता है। इस सिस्टम में कार की कीमत के हिसाब से टैक्स बढ़ता जाता है। यानी जितनी महंगी कार होगी, उतना ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा। यही कारण है कि किसी राज्य में कार अपेक्षाकृत सस्ती लगती है, जबकि दूसरे राज्य में वही कार ज्यादा महंगी दिखाई देती है।
रजिस्ट्रेशन फीस भी कीमत को प्रभावित करती है
रोड टैक्स के अलावा रजिस्ट्रेशन फीस भी कार की अंतिम कीमत को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है। वाहन खरीदने के बाद उसे संबंधित राज्य के Regional Transport Office (RTO) में रजिस्टर कराना जरूरी होता है। हर राज्य का RTO अपने नियमों के अनुसार, रजिस्ट्रेशन फीस तय करता है। कुछ राज्यों में अतिरिक्त स्थानीय शुल्क भी जोड़े जाते हैं, जिससे वाहन रजिस्ट्रेशन की कुल लागत बढ़ जाती है। इसी वजह से अलग-अलग शहरों में कार की ऑन-रोड कीमत में अंतर देखने को मिलता है।
उदाहरण से समझें कीमत का अंतर
अगर इसे एक उदाहरण से समझें तो Hyundai Creta की कीमत को देखा जा सकता है। इसके Creta E पेट्रोल वेरिएंट की एक्स-शोरूम कीमत लगभग 10.72 लाख से 10.79 लाख रुपये के बीच है। लेकिन जब इसकी ऑन-रोड कीमत अलग-अलग शहरों में देखी जाती है तो इसमें स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। दिल्ली में इसकी ऑन-रोड कीमत करीब 12.60 लाख रुपये पड़ती है। वहीं कोलकाता में यह लगभग 12.50 लाख से 12.79 लाख रुपये के बीच हो सकती है।
बेंगलुरु में यही कार करीब 13.36 लाख रुपये तक पहुंच जाती है, जबकि हैदराबाद में इसकी कीमत लगभग 13.51 लाख रुपये तक हो सकती है। मुंबई में यह करीब 12.84 लाख रुपये में मिलती है। इससे साफ समझा जा सकता है कि टैक्स और स्थानीय शुल्क के कारण एक ही कार की कीमत शहर के हिसाब से बदल जाती है।
फ्यूल टाइप का भी पड़ता है असर
कार की कीमत पर फ्यूल टाइप का भी असर पड़ता है। कई राज्यों में पेट्रोल और डीजल कारों पर अलग-अलग टैक्स लगाया जाता है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में 10 लाख रुपये से ज्यादा कीमत वाली पेट्रोल कारों पर लगभग 10 प्रतिशत रोड टैक्स लगाया जाता है। वहीं इसी श्रेणी की डीजल कारों पर करीब 12.5 प्रतिशत टैक्स देना पड़ता है। इसका मतलब यह है कि अगर दो कारें समान कीमत की हों लेकिन एक पेट्रोल और दूसरी डीजल हो, तो उनकी ऑन-रोड कीमत अलग हो सकती है।
कार खरीदने से पहले सही जानकारी लेना क्यों जरूरी है?
कार खरीदने से पहले सिर्फ एक्स-शोरूम कीमत देखकर फैसला लेना सही नहीं होता। असल कीमत ऑन-रोड कीमत होती है, जिसमें सभी टैक्स और चार्ज शामिल होते हैं। क्योंकि हर राज्य के टैक्स और रजिस्ट्रेशन नियम अलग होते हैं, इसलिए कार खरीदने से पहले अपने शहर की ऑन-रोड कीमत की सही जानकारी लेना बेहद जरूरी है। इससे आपको कार की वास्तविक लागत समझने में आसानी होती है और बजट के अनुसार सही फैसला लेने में मदद मिलती है।


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