Car Modification: बेस मॉडल वाली कार खरीद मॉडिफाई करने से क्या वैल्यू बढ़ती है या घटती?
Car Modification: भारत जैसे कीमत-संवेदनशील कार बाजार में अक्सर ग्राहक कार का बेस मॉडल खरीदते हैं और बाद में उसे आफ्टरमार्केट एक्सेसरीज से अपग्रेड कर लेते हैं। इस प्रक्रिया को आमतौर पर बेस-टू-टॉप कन्वर्जन कहा जाता है। इसमें लोग टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम, अलॉय व्हील, लेदर सीट कवर, एम्बिएंट लाइटिंग और कभी-कभी सनरूफ तक लगवा लेते हैं।

पहली नजर में यह तरीका सस्ता और समझदारी भरा लग सकता है, क्योंकि बेस मॉडल सस्ता होता है और जरूरत के हिसाब से फीचर्स बाद में जोड़े जा सकते हैं। हालांकि हकीकत यह है कि इस तरह के मॉडिफिकेशन कार की वारंटी, रीसेल वैल्यू और भरोसेमंदता पर असर डाल सकते हैं। आइए समझते हैं कि बेस मॉडल खरीदकर मॉडिफाई करना कितना सही या गलत हो सकता है।
वारंटी पर पड़ सकता है सीधा असर
कार में आफ्टरमार्केट मॉडिफिकेशन करने का सबसे बड़ा प्रभाव उसकी कंपनी वारंटी पर पड़ता है। अधिकांश वाहन निर्माता साफ तौर पर बताते हैं कि अगर कार को फैक्ट्री स्पेसिफिकेशन से अलग तरीके से बदला जाता है, तो उससे जुड़े कुछ सिस्टम की वारंटी समाप्त हो सकती है।
सबसे ज्यादा खतरा कार के इलेक्ट्रिकल सिस्टम को होता है। उदाहरण के लिए अगर कोई मालिक आफ्टरमार्केट टचस्क्रीन, LED लाइट्स या बड़ा साउंड सिस्टम लगवाता है, तो इसके लिए अक्सर कार की फैक्ट्री वायरिंग में बदलाव करना पड़ता है। एक बार वायरिंग के साथ छेड़छाड़ हो जाए तो भविष्य में अगर इलेक्ट्रिकल सिस्टम में कोई खराबी आती है, तो कंपनी उस पर वारंटी क्लेम देने से मना कर सकती है।
इसी तरह कुछ लोग बेहतर परफॉर्मेंस के लिए ECU रीमैपिंग, हाई-परफॉर्मेंस एयर फिल्टर या कस्टम एग्जॉस्ट लगवाते हैं। ऐसे बदलाव इंजन और ट्रांसमिशन पर असर डाल सकते हैं, जिससे इन हिस्सों की वारंटी भी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा बड़े अलॉय व्हील या अलग सस्पेंशन लगाने से स्टीयरिंग और सस्पेंशन सिस्टम की वारंटी भी खतरे में पड़ सकती है।
मॉडिफिकेशन से कम हो सकती है रीसेल वैल्यू
कई कार मालिकों को लगता है कि अगर वे अपनी कार में एक्सेसरीज और फीचर्स लगवाते हैं, तो उसकी रीसेल वैल्यू बढ़ जाएगी। लेकिन वास्तव में ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता। कार खरीदने वाले अधिकतर लोग स्टॉक या बिना मॉडिफिकेशन वाली कार को प्राथमिकता देते हैं। इसका कारण यह है कि ऐसी कारों को ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है और उनके रखरखाव में कम परेशानी होती है। दूसरी ओर ज्यादा मॉडिफाइड कारों के खरीदार सीमित होते हैं, जिससे ऐसी कार को बेचना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।
इसके अलावा आफ्टरमार्केट एक्सेसरीज़ की कीमत समय के साथ तेजी से घटती है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी कार मालिक ने अपनी कार में 50,000 रुपये के अपग्रेड कराए हैं, तो कार बेचते समय यह जरूरी नहीं कि उसे उतनी कीमत वापस मिल पाए। ज्यादातर मामलों में इन एक्सेसरीज की वैल्यू बहुत कम मानी जाती है।
समय के साथ सामने आ सकती हैं तकनीकी समस्याएं
लोकल आफ्टरमार्केट से कराए गए मॉडिफिकेशन अक्सर फैक्ट्री फिटेड पार्ट्स जितने सटीक और भरोसेमंद नहीं होते। कई बार इंस्टॉलेशन के दौरान फिटिंग सही नहीं होती या पार्ट्स की क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं होती।
समय के साथ इसका असर दिखाई देने लगता है। कार के पैनल से आवाज आना, वायरिंग ढीली होना या इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में गड़बड़ी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। इसके अलावा अगर किसी कार में आफ्टरमार्केट सनरूफ या बॉडी से जुड़ा बड़ा बदलाव किया जाता है, तो इससे वाहन की संरचना भी कमजोर हो सकती है। कुछ मामलों में ऐसे बदलाव सुरक्षा के लिहाज से भी ठीक नहीं माने जाते और कुछ प्रकार के मॉडिफिकेशन कई जगहों पर गैरकानूनी भी हो सकते हैं।
बीमा और कानूनी नियमों पर भी पड़ सकता है असर
कार में किए गए मॉडिफिकेशन का असर बीमा क्लेम पर भी पड़ सकता है। अगर वाहन मालिक ने कार में किए गए बदलावों की जानकारी बीमा कंपनी को नहीं दी है और किसी दुर्घटना में वही हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो बीमा कंपनी क्लेम देने से मना कर सकती है।
इसके अलावा भारत में कुछ प्रकार के मॉडिफिकेशन कानून के तहत प्रतिबंधित माने जाते हैं। जैसे तेज आवाज वाले एग्जॉस्ट, इंजन स्वैप, स्ट्रक्चरल बदलाव या बहुत ज्यादा हाई-इंटेंसिटी लाइट्स लगाना कई मामलों में गैरकानूनी हो सकता है। ऐसे मामलों में वाहन मालिक को जुर्माना या कानूनी कार्रवाई का सामना भी करना पड़ सकता है।
क्या बेस मॉडल खरीदकर मॉडिफाई करना सही फैसला है?
अगर कोई व्यक्ति अपनी कार को लंबे समय तक इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है, तो बेहतर विकल्प यह हो सकता है कि वह शुरुआत में ही कार का हाई वेरिएंट खरीद ले। फैक्ट्री फिटेड फीचर्स वाहन के साथ बेहतर तरीके से काम करते हैं और उनकी वारंटी भी सुरक्षित रहती है।
हालांकि अगर कोई व्यक्ति फिर भी मॉडिफिकेशन करना चाहता है, तो उसे बेहतर क्वालिटी के प्लग-एंड-प्ले एक्सेसरीज का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ ही कार में किए गए बदलावों की जानकारी बीमा कंपनी को देना भी जरूरी है, ताकि भविष्य में क्लेम से जुड़ी कोई परेशानी न आए।


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