पेट्रोल पंप जाने की टेंशन हो जाएंगी खत्म, अपनी पुरानी गाड़ी को इलेक्ट्रिक कार में बदलने का ये हैं तरीका
हाल के समय में अमेरिका-ईरान के बीच बढ़े तनाव की वजह से दुनियाभर के कई देशों में पेट्रोलियम और गैस से जुड़ी हुई समस्या का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे माहौल में इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ रुझान बढ़ता जा रहा है, क्योंकि यह फ्यूल पर निर्भरता कम करने का विकल्प माना जाता है। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी से जुड़ी एक अहम तकनीक EV रेट्रोफिटिंग की भी चर्चा होती है। इसके जरिए पुरानी पेट्रोल या डीज़ल कारों को इलेक्ट्रिक वाहन में बदला जा सकता है। हालांकि यह विकल्प सुनने में आकर्षक लगता है, लेकिन इसके फायदे और चुनौतियां दोनों हैं। इसलिए किसी भी वाहन को इलेक्ट्रिक में बदलने से पहले इसके सभी पहलुओं को समझना जरूरी है।

EV रेट्रोफिटिंग क्या होती है?
EV रेट्रोफिटिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी मौजूदा पेट्रोल या डीजल वाहन को इलेक्ट्रिक वाहन में बदला जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान वाहन का इंजन, फ्यूल टैंक, फ्यूल पाइप, एग्जॉस्ट सिस्टम और इंजन से जुड़े अन्य हिस्से हटा दिए जाते हैं। इनकी जगह इलेक्ट्रिक मोटर, बैटरी और कंट्रोलर लगाए जाते हैं, जिससे वाहन पूरी तरह इलेक्ट्रिक पर चलने लगता है। इसका उद्देश्य पुरानी गाड़ियों को इस्तेमाल में बनाए रखते हुए उन्हें अधिक आधुनिक और ईंधन-मुक्त बनाना है।
फ्यूल कार को EV में बदलने की लागत कितनी आती है?
रेट्रोफिटिंग का बाजार अभी शुरुआती दौर में है और इसमें ज्यादातर छोटे स्टार्टअप और कंपनियां काम कर रही हैं। इस कन्वर्जन की कीमत लगभग 6.5 लाख रुपये हो सकती है। इस बदलाव के बाद वाहन की रनिंग कॉस्ट करीब 1 रुपये प्रति किलोमीटर हो सकती है और एक बार चार्ज करने पर लगभग 200 किलोमीटर की रेंज मिल सकती है।
इसी तरह Maruti Suzuki Swift Dzire को इलेक्ट्रिक में बदलने की अनुमानित लागत लगभग 6 से 7 लाख रुपये बताई गई है और इसमें करीब 300 किलोमीटर की रेंज मिल सकती है। कंपनी बैटरी-एज-ए-सर्विस (BaaS) मॉडल लाने की योजना भी बना रही है, जिससे शुरुआती खर्च कम किया जा सके।
अन्य कंपनियां कैसे कर रही हैं रेट्रोफिटिंग?
रेट्रोफिटिंग सेक्टर में कुछ अन्य कंपनियां भी नए प्रयोग कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर Folks Motor नाम की कंपनी ऐसी तकनीक पर काम कर रही है जिसमें पेट्रोल या डीज़ल कार में इलेक्ट्रिक बैटरी जोड़कर उसे हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहन में बदला जा सकता है।
कंपनी के अनुसार Maruti Dzire को हाइब्रिड इलेक्ट्रिक में बदलने की लागत लगभग 2.5 लाख रुपये हो सकती है। वहीं Brezza के लिए यह खर्च करीब 3 लाख रुपये और Ertiga के लिए लगभग 3.5 लाख रुपये बताया गया है। इस बदलाव के बाद वाहन की माइलेज में 40 से 60 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है और रनिंग कॉस्ट में 30 से 50 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
क्या अपनी कार को EV में बदलना फायदेमंद है?
रेट्रोफिटिंग के समर्थकों का कहना है कि इससे वाहन मालिकों को कम मेंटेनेंस खर्च और लंबी अवधि में कम रनिंग कॉस्ट का फायदा मिल सकता है। इलेक्ट्रिक वाहन चलाने से कई नियमों और अनुपालन से जुड़े झंझट भी कम हो सकते हैं।
हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि व्यक्तिगत वाहन मालिकों के लिए यह विकल्प हमेशा आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं होता। रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार किसी पेट्रोल या डीज़ल वाहन को इलेक्ट्रिक में बदलने की लागत एक नई इलेक्ट्रिक कार की कीमत का लगभग 60 से 70 प्रतिशत तक हो सकती है।
क्योंकि बैटरी की कीमत ही नई EV की कुल लागत का लगभग 50 प्रतिशत होती है, इसलिए रेट्रोफिटिंग भी काफी महंगी हो जाती है। इसके अलावा रेट्रोफिटेड गाड़ियों में वारंटी नहीं होती और वाहन पहले से इस्तेमाल किया हुआ होता है, जिससे कई उपभोक्ताओं को यह विकल्प कम आकर्षक लगता है।
रिसर्च क्या बताती है?
रिसर्च के अनुसार, अगर 10 साल की अवधि में कुल लागत यानी टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (TCO) का विश्लेषण किया जाए तो रेट्रोफिटेड EV की लागत थोड़ी कम हो सकती है।
चार पहिया वाहनों के मामले में रेट्रोफिटेड EV की TCO लगभग 6.32 रुपये प्रति किलोमीटर बताई गई है। वहीं नई EV के लिए यह लगभग 7.07 रुपये प्रति किलोमीटर और नए पेट्रोल या डीज़ल वाहन के लिए करीब 7.197 रुपये प्रति किलोमीटर है।
दो पहिया वाहनों के लिए रेट्रोफिटेड EV की लागत लगभग 1.6 रुपये प्रति किलोमीटर बताई गई है, जबकि नई EV के लिए यह करीब 2.36 रुपये प्रति किलोमीटर है। हालांकि वास्तविक परिस्थितियों में वाहन की लाइफ और बैटरी की परफॉर्मेंस को लेकर अभी स्पष्ट डेटा उपलब्ध नहीं है।
विशेषज्ञ रेट्रोफिटिंग को लेकर क्या कहते हैं?
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि रेट्रोफिटिंग से वाहन की उम्र केवल 4 से 6 साल तक ही बढ़ सकती है। इस दौरान बैटरी की क्षमता भी धीरे-धीरे कम होती रहती है, जिससे वाहन की परफॉर्मेंस प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा बैटरी को सुरक्षा मानकों के अनुरूप बनाना जरूरी होता है और इसके लिए AIS 156 जैसे मानकों का पालन करना पड़ता है। यही कारण है कि रेट्रोफिटिंग की प्रक्रिया आसान या सस्ती नहीं मानी जाती।
रेट्रोफिटिंग अभी क्यों नहीं पकड़ पाई रफ्तार?
रेट्रोफिटिंग के धीमे विस्तार का एक बड़ा कारण इसकी ऊंची लागत है। हर वाहन मॉडल के लिए अलग कन्वर्जन किट बनानी पड़ती है और प्रत्येक किट को ARAI या ICAT जैसी संस्थाओं से मंजूरी लेनी होती है। इसके अलावा इन किट के हर हिस्से पर 18 प्रतिशत GST लगता है, जबकि नई इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर सिर्फ 5 प्रतिशत GST लगता है। इससे रेट्रोफिटिंग की कुल लागत और बढ़ जाती है।
किट के रिसर्च और डेवलपमेंट तथा प्रमाणन की प्रक्रिया भी महंगी होती है, जिसकी लागत 50 लाख रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये से अधिक तक हो सकती है। चूंकि अभी मांग कम है, इसलिए बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं हो पाता और कीमतें कम नहीं हो पातीं।


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