क्या होता है कार के इंजन में 'Cylinder' का मतलब, कहीं आपने गैस तो नहीं समझ लिया?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है। अमेरिका और चीन के बाद भारतीय बाजार में ही सबसे ज्यादा गाड़ियों का कारोबार होता है। देश में किफायती दोपहिया वाहन से लेकर लीटर क्लास मोटरसाइकिल और तमाम सेगमेंट के अंदर कारें उपलब्ध हैं। ग्राहक अपनी जरूरतों के हिसाब से वाहन चुनते हैं।
नई गाड़ी खरीदते समय हम यह जरूर देखते हैं कि उसका इंजन कितना शक्तिशाली है। जब हम शोरूम पर गाड़ी देखने पहुंचते हैं, तो वहां मौजूद सेल्समैन बताते हैं कि इस कार में इतने सिलेंडर का इंजन लगा है। क्या आपने कभी सोचा है कि इस सिलेंडर का क्या मतलब है।

कार के इंजन में सिलेंडर कम होने पर माइलेज क्यों बढ़ता है, या फिर सिलेंडर की संख्या बढ़ने पर पावरट्रेन ज्यादा शक्तिशाली क्यों हो जाता है? अगर आपका जवाब 'नहीं' है, तो ये लेख आपके लिए है। अपने इस आर्टिकल में हम इन्हीं सवालों का जवाब देने की कोशिश करेंगे।
'सिलेंडर' का क्या मतलब: पेट्रोल और डीजल कारों में 'सिलेंडर' का मतलब इंजन के उस हिस्से से है, जहां ईंधन जलकर गाड़ी को चलाने की ताकत देता है। सिलेंडर को समझने के लिए इंजन के काम करने का तरीका, उसकी ताकत और ईंधन की खपत को जानना जरूरी है। आइए इसे आसान भाषा में जानने की कोशिश करते हैं।
सिलेंडर इंजन के अंदर गोल-मटोल खाली जगह होती है, जिसमें एक पिस्टन रखा जाता है और ये ऊपर-नीचे मूव करता है। इंजन में सिलेंडर की संख्या अलग-अलग होती है। छोटे इंजनों में एक, दो और तीन सिलेंडर से लेकर बड़ी लग्जरी या स्पोर्ट्स कारों में 16 तक सिलेंडर हो सकते हैं।
मार्केट में मौजूद ज्यादातर कारों के इंजन में तीन, चार, छह या आठ सिलेंडर होते हैं। चार सिलेंडर वाला इंजन सबसे आम है, क्योंकि यह पावर, परफॉरमेंस के साथ बेहतर फ्यूल एफिशियंसी भी प्रदान करता है। प्रोडक्शन कॉस्ट के हिसाब से भी यह एक किफायती विकल्प है।
सिलेंडर का काम क्या है: इंजन के हर सिलेंडर में ईंधन जलने का प्रोसेस पूरा होता है। हम इसे 4 आसान स्टेप्स में समझ सकते हैं- एयर-फ्यूल इंटेक करना, प्रेस करना, जलाना और धुआं निकालना। पहली स्टेप में पिस्टन नीचे जाता है और हवा के साथ पेट्रोल को मिक्स करता है। हालांकि, डीजल इंजन में पिस्टन का काम केवल एयर इंटेक करना होता है।
दूसरे फेज में पिस्टन ऊपर जाकर इस मिश्रण को प्रेस करता है, जिससे उसकी ताकत बढ़ती है। तीसरे फेज में पेट्रोल इंजन में स्पार्क प्लग से चिंगारी निकलती है या डीजल इंजन में हाई प्रेशर से फ्यूल इंजेक्ट होता है, जिससे पावरट्रेन के अंदर एक ब्लास्ट होता है।
इंजन में हुआ ये ब्लास्ट पिस्टन को नीचे धकेलता है, जिससे इंजन को ताकत मिलती है। आखिरी फेज में पिस्टन फिर ऊपर जाकर जला हुआ धुआं बाहर निकालता है। यह प्रक्रिया बहुत तेजी से बार-बार होती है। सभी सिलेंडर के पिस्टन एक क्रैंकशाफ्ट से जुड़े होते हैं, जो उनकी ऊपर-नीचे की गति को गोल चक्कर में बदलकर गाड़ी के पहियों तक ताकत पहुंचाता है।
ज्यादा सिलेंडर कम माइलेज: सिलेंडर की संख्या गाड़ी की ताकत, फ्यूल की खपत और परफॉरमेंस को प्रभावित करती है। ज्यादा सिलेंडर का मतलब है ज्यादा ताकत, क्योंकि इंजन के अंदर एक बार में कई ब्लास्ट होते हैं, जिससे गाड़ी तेज चलती है। मिसाल के तौर पर आठ सिलेंडर वाला V8 इंजन चार सिलेंडर वाले इंजन से ज्यादा ताकतवर होगा।
कम सिलेंडर ज्यादा माइलेज: इंजन में ज्यादा सिलेंडर होने से ईंधन ज्यादा खर्च होता है और पावरट्रेन की सर्विस कॉस्ट भी बढ़ जाती है। दूसरी ओर, तीन या चार सिलेंडर वाले इंजन कम ईंधन खाते हैं और प्रदूषण भी कम करते हैं, जो छोटी कारों या रोजमर्रा की गाड़ियों के लिए बेहतर हैं। हालांकि, ये कम शक्तिशाली होतेहैं।
सार: हमें उम्मीद है कि आप समझ गए होंगे कि गाड़ी के इंजन में सिलेंडर क्या होते हैं और इनका उपयोग क्या है। अगर पूरी बात का सार निकाला जाए, तो वह यही है कि कम सिलेंडर वाली गाड़ियां ज्यादा माइलेज देती हैं और कम पावरफुल होती हैं। वहीं, सिलेंडर ज्यादा होन पर ईंधन की खपत और एमीशन बढ़ने के साथ गाड़ी की परफॉरमेंस में भी बढ़ोतरी होती है।


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