पीयूष गोयल: हुंडई और किया ने करवाया करोड़ों डाॅलर का घाटा, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से भारत को हो रहा नुकसान
केंद्रीय मंत्री पियूष गोयल (Piyush Goel) ने कहा कि कोरियाई कार निर्माता हुंडई (Hyundai) और किया (Kia) ने कोरिया और दूसरे देशों के साथ व्यापार घाटे में भारत का अरबों डॉलर का नुकसान करवाया है। केंद्रीय उद्योग और व्यापार मंत्री पियूष गोयल ने यह बात शनिवार को तीन दिवसीय एशिया आर्थिक संवाद के समापन समारोह में कही।
गोयल ने कहा, "भारत की फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) का हुंडई और किया जैसी कोरियाई कार कंपनियों (Korean Car Manufacturers) ने जमकर फायदा उठाया है। फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के जरिये ये कंपनियां भारत में अंधाधुंध आयात कर रही हैं। इससे भारत को करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ है। यह सार्वजनिक रूप से कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है।"

गोयल ने बताया कि कोरिया के साथ अपने बाजारों को खोलने के लिए बातचीत चल रही है। लेकिन कोरियाई बिजनेस की अत्यधिक राष्ट्रवादी भावना हमारे लिए चुनौती बन गई है। वे अधिक कीमत के बावजूद लोकल मार्किट से सामान खरीद रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस भावना की हमारे लाभ केंद्रित घरेलू व्यापारियों में कमी है। वे सस्ती कीमत की खोज में दुनिया के किसी भी देश से सामान खरीद सकते हैं।

गोयल ने आगे कहा, "कोरिया और जापान की सरकारें अपने यहां भारत से किसी भी आयात को रोकती नहीं है। लेकिन फिर भी हम वहां 1 टन स्टील नहीं बेच सकते। दुर्भाग्य से, भारतीयों में ऐसी राष्ट्र भावना नहीं है।
गोयल ने कहा कि अगर हम 10 पैसे बचा सकते हैं, तो हम कहीं से भी और किसी से भी आयात करके खुश हैं। अगर हम अपने व्यापार में 2% अधिक लाभ कमा सकते हैं तो हम चीन से भी आयात करके खुश हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद है।

उन्होंने कहा कि वे इन देशों का उदाहरण देकर भारतीय उद्योगों और उपभोक्ताओं को आईना दिखाना चाहते हैं। गोयल ने कहा, "कोरिया और जापान अपने घरेलू बाजार से स्टील खरीदेंगे, भले ही इसकी कीमत सौ डॉलर प्रति टन अधिक हो, लेकिन वे किसी भारतीय फर्म को अपना आपूर्तिकर्ता नहीं बनने देंगे।"
गोयल ने कहा कि इसपर सरकारों के तरफ से रोक नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय भावना है जो व्यवसाय अपने स्वयं के उद्योग का समर्थन करने के लिए प्रदर्शित करते हैं। लेकिन भारतीय व्यवसाय इस भावना के प्रति उदासीन हैं।

मंत्री ने कहा कि उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएं विनिर्माण क्षेत्र को कुछ हद तक मदद कर सकती हैं, क्योंकि अंततः उन्हें 'प्रतिस्पर्धी होने, अपने पैरों पर खड़े होने और उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण उत्पाद प्रदान करने' की आवश्यकता जरूरत समझ आएगी।


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