डीजल कारों के भविष्य पर मंडरा रहा है खतरा, अगले साल इस नए नियम से बढ़ेगी मुसीबत

देश में डीजल यात्री वाहनों का भविष्य धूमिल होता जा रहा है। लगभग एक दशक पहले जहां डीजल कारों की हिस्सेदारी 54 फीसदी थी, वहीं अब यह घटकर 20 फीसदी से भी कम रह गई है। भारत में कार्बन उत्सर्जन पर सख्त नियम लागू होने के बाद कार कंपनियों ने डीजल कारों का उत्पादन कम कर दिया है। वहीं कई कंपनियों ने अपनी लाइनउप से डीजल वाहनों को पूरी तरह हटा दिया है। डीजल वाहनों की बिक्री में गिरावट के कई कारण हैं। इसमें पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कम होते अंतर के साथ-साथ कई शहरों में डीजल वाहनों पर लगाए गए प्रतिबंध भी जिम्मेदार हैं।

डीजल की बढ़ती कीमत बनी बड़ी वजह

मौजूदा समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अंतर सबसे कम है। साल 2012 में एक लीटर पेट्रोल और डीजल की कीमत में 32 रुपये का अंतर था जो अब घटकर केवल 7 रुपये रह गया है। ईंधन की कीमतों को बाजार से जोड़ने के बाद पिछले कुछ सालों में डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है।

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इसके अलावा दिल्ली-एनसीआर में 10 साल से ज्यादा पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध ने डीजल कारों को एक बड़े बाजार से दूर कर दिया है। डीजल वाहनों पर प्रतिबंध के वजह से इन्हें अब प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के रूप में देखा जाने लगा है। इस वजह से इनकी रीसेल वैल्यू भी कम हो गई है।

नए उत्सर्जन नियम से महंगी हुई कारें

बता दें कि अप्रैल, 2020 में भारत सरकार ने बीएस-5 उत्सर्जन मानकों को नजरअंदाज करते हुए बीएस4 के बाद बीएस-6 नियमों को लागू कर दिया। इससे कार कंपनियों पर अपने वाहनों को और अधिक स्वच्छ बनाने का दबाव बढ़ गया। बीएस-6 नियमों के आने से डीजल वाहनों में उत्सर्जन कम करने के लिए नए उपकरणों को जोड़ने की जरूरत पड़ी। जिससे छोटी डीजल कारों की कीमतें आसमान छू गईं।

मारुति सुजुकी और फॉक्सवैगन जैसी बड़ी कंपनियों ने तो इस वजह से डीजल कारों का उत्पादन ही बंद कर दिया। फिलहाल दोनों कंपनियां अपने लाइनअप में एक भी डीजल कार नहीं बेच रही हैं। हाल ही में टोयोटा ने भारत में इनोवा के डीजल मॉडलों को बंद करने का ऐलान किया है।

देश में 1 अप्रैल 2023 से बीएस-6 उत्सर्जन नियमों का दूसरा चरण लागू होने वाला है। जानकारों का मानना है कि इसमें वाहनों को अपग्रेड कर उत्सर्जन को और कम करने का दबाव बढ़ेगा। अब इससे कई कंपनियों की डीजल कारों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। बता दें कि डीजल कारों में पेट्रोल की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन काफी अधिक होता है।

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घट रही डीजल वाहनों की हिस्सेदारी

लगभग एक दशक पहले डीजल कारों की बिक्री पेट्रोल कारों की तरह ही हो रही थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 में जहां डीजल वाहनों की हिस्सेदारी 54% के साथ पेट्रोल वाहनों से भी ज्यादा थी, वहीं 2022 में यह कम होकर मात्रा 18 प्रतिशत रह गई है। छोटी डीजल कारों के मामले में यह स्थिति और भी खराब है। बाजार में छोटी डीजल कारों की हिस्सेदारी अब केवल 1% रह गई है। वहीं कॉम्पैक्ट एसयूवी में यह 16% और फुल साइज एसयूवी में 80% है।

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Hindi
English summary
Future of diesel cars in strengthening emission norms in india
 
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