टाटा मोटर्स ने चुकाया 4.6 लाख रुपए का हर्जाना, पर मौत के बाद!
टाटा मोटर्स को एक ग्राहक को लगभग चार लाख रुपए हर्जाना चुकाना पड़ा। जी हां, मुंबई में टाटा इंडिका के मालिक को सही सर्विस न देने की वहज से राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने टाटा मोटर्स और आधिकारिक डीलरशीप जहां से कार खरीदी गई थी, दोनों को मिलकर लगभग चार लाख रुपए का हर्जाना देना पड़ा।

आयोग के फैसले अनुसार मुंबई निवासी स्वर्गिय आर भटवाडे़कर को 4,58,853 रुपए का हर्जना देना होगा। इसके अलावा 10,000 रुपए अतिरिक्त लिटिगेशन कॉस्ट का भी देना पड़ेगा। ये राशी टाटा मोटर्स कंपनी और डीलरशीप को मिलकर चुकानी होगी। बता दें कि ये फैसला आर के अग्रवाल की अध्यक्षता वाले बेंच ने दिया।

NCDRC ने अपने आदेश में कहा कि "किसी भी दस्तावेजी साक्ष्य की अनुपस्थिति में यह साबित करने के लिए कि कार वास्तव में शिकायतकर्ता (आर भटवाडे़कर) को सौंपी गई थी, हम मानते हैं कि निर्माता और डीलर के हिस्से में सेवा की कमी है"।

कमिशन ने ये भी कहा कि कार जब डीलरशीप के पास सर्विस के लिए गई थी तब वो वारंटी में थी और उसके ओडोमीटर पर देखा जा सकता था कि कार 2500 किलोमीटर से कम चली है। भटवाड़ेकर ने मई 2000 में टाटा इंडिका खरीदी थी। उस समय उनको 15 मई की डिलेवरी डेट दी गई थी पर कार उनके पास 26 मई को डिलेवर की गई।

जब कार भटवाड़ेकर को डिलेवर की गई तब उन्होंने उसे लेने से मना कर दिया और कहा कि यह सड़क पर चलने लायक नहीं है। भटवाड़ेकर को शक हुआ कि कार में इलेक्ट्रिकल फॉल्ट है, इस पर भी डीलरशीप ने बिना उनकी गैरमौजूदगी में कार उनके घर छोड़ गए।

डीलरशीप वाले इस बात का जवाब भी नहीं दे पाए की भटवाड़ेकर ने जब कार लेने से मना कर दिया और एकनॉलेजमेंट शीट पर भी साइन नहीं किया तो फिर उन्होंने कार वापस क्यों नहीं ली। खंडपीठ ने टिप्पणी की, "यह समझ में नहीं आता है कि डीलर ने कार डिलेवरी के समय एक पावती लेने की नियमित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया।"

वहीं टाटा मोटर्स ने दावा किया है कि कार में आ रही परेशानियों को दुर कर ओनर को सौंपा गया लेकिन फिर भी उन्होंने एकनॉलेजमेंट देने से मना किया। हालांकि अंत में आयोग ने भटवाड़ेकर के पक्ष में फैसला दिया।

वैसे टाटा मोटर्स काफी बड़ा और सम्मानजनक ऑटोमेकर है जो ग्राहकों को की सुविधा और सहायता का ध्यान रखता है लेकिन कई बार डीलरशीप वाले अपना काम ठीक से नहीं करते हैं और निर्माताओं का नाम खराब होता है। देखा जाए तो इसमें डीलरशीप को ही पुरी तरह से दोश नहीं दिया जा सकता, उसमें कई व्यक्तिगत लोग भी होते हैं दो कई बार अपना काम सही से नहीं करते हैं।


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