इस वजह से 10 हजार इलेक्ट्रिक वाहनों के रिप्लेसमेंट में फेल हो रही है सरकार
देश भर में ईंधन की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी ने न केवल आम लोगों को परेशान कर रखा है बल्कि सरकार की भी नींदे उड़ी हुई है। पिछले सार भारत सरकार ने 10,000 इलेक्ट्रिक वाहनों का आॅर्डर दिया था।
देश भर में ईंधन की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी ने न केवल आम लोगों को परेशान कर रखा है बल्कि सरकार की भी नींदे उड़ी हुई है। पिछले सार भारत सरकार ने 10,000 इलेक्ट्रिक वाहनों का आॅर्डर दिया था। लेकिन अब सरकार की इस योजना में लगातार देरी हो रही है।

सरकार ने इन सभी वाहनों की आपूर्ति में अपने हाथ तंग कर लिये है। गौरतलब हो कि, इन इलेक्ट्रिक वाहनों को सरकार द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले पेट्रोल और डीजल वाहनों की जगह पर रिप्लेस किया जाना था। अब सरकार ने इन वाहनों की आपूर्ति की इस योजना को और एक साल के लिए आगे बढ़ा दिया है।

आपको बता दें कि, ये वाहन सरकारी उपयोग में लाये जाने के लिए खरीदे जा रहे है। इसके लिए सरकार ने बाकायदा टेंडर जारी किया था जिसे देश की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी टाटा मोटर्स और प्रमुख एसयूवी वाहन निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ने इस टेंडर को जीता था।

गौरतलब हो कि, इस योजना के अनुसार इस वर्ष 2018 में जून माह तक वाहनों की आपूर्ति हो जानी थी। सरकारी संस्था एनर्जी इफिशिएंसी सर्विस लिमिटेड Energy Efficiency Services Ltd. (EESL) ने बीते वर्ष 2017 के सितंबर माह में ये टेंडर जारी किया था। जिसमें 10,000 इलेक्ट्रिक वाहनों की आपूर्ति की जानी थी।

इस योजना के अनुसार बीते नवंबर माह तक 500 इलेक्ट्रिक वाहनों की आपूर्ति की जानी थी और बाकी के वाहनों को जून 2018 तक रिप्लेस करना था। यदि तत्कालिक स्थिती पर गौर करें तो अब तक महज 150 वाहनों को अकेले दिल्ली में रिप्लेस किया गया है और 100 वाहनों को आंध्र प्रदेश में रिप्लेस किया गया है।

चार्जिंग स्टेशन है प्रमुख कारण:
सरकार द्वारा वाहनों के रिप्लेसमेंट में आने वाली इस देरी के पीछे मुख्य कारण चार्जिंग स्टेशनों की कमी है। एक अाधिकारिक जानकारी के अनुसार देश भर में चार्जिंग स्टेशनों की भारी कमी है। इस समय तक इन वाहनों के लिए महज 200 चार्जिंग स्टेशन ही स्थापित हो सके हैं जिनमें से अकेले 100 स्टेशन देश की राजधानी और उसके आस पास के इलाकों में है।

देश भर में चार्जिंग स्टेशनों के निर्माण के फेल होने के पीछे एक प्रमुख कारण ये है कि, अभी उनकी उतनी डिमांड नहीं है और न ही सकारात्मक रिस्पांस ही मिल रहा है। ऐसी भी खबरे आ रही है कि, ईईएसएल दूसरे टेंडर को जारी करने की योजना बना रहा है।
आपको बता दें कि, सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रयोग पर इसलिए ज्यादा जोर दे रही है ताकि देश में ईंधन की खपत और उसकी निरभरता पर कमी आये। यदि सरकार स्वयं के प्रयोग में लाये जाने वाले वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहनों को शामिल करेगी तो इससे कम से कम ईंधन का उपभोग होगा और इसका फायदा देश को भी मिलेगा।

प्रधानमंत्री की ही मंशा:
देश भर में इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रयोग को लेकर आयी इस तेजी के पीछे और कोई नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री स्वयं है। प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ निर्देश हैं कि, आगामी 2030 तक देश भर में सरकारी कार्यों के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले 30 प्रतिशत वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों से रिप्लेस कर दिया जाये। फिलहाल सरकार की इस योजना को पूर्ण होने में कितना वक्त लगेगा इस बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन ये साफ है कि, इलेक्ट्रिक वाहनों के रिप्लेसमेंट में कहीं न कहीं सरकारी की लचर व्यवस्था ही जिम्मेवार है।


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