भारत में डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय दामों के बराबर
भारत सरकार ने देश में हर महीने डीजल की कीमत 50 पैसे बढ़ाने का फैसला किया है। इसके पीछे का विचार यह था कि तेल कंपनियों को डीजल पर होने वाले घाटे को कम किया जा सके। अब भारत में ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के आसपास हैं।
पेट्रोलियम मंत्रालय डीजल के दामों में 50 पैसे प्रति लीटर की दर से बढ़ोत्तरी करती रहेगी। रविवार को ही इस बारे में फैसला लिया गया। हालांकि चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह माना जा रहा है कि इस बढ़ोत्तरी को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है। संभव है कि राजनेता अस्थायी तौर पर दाम बढ़ाने की प्रकिया को रोक दें।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि, "अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल क्षेत्र में कोई बड़ी घटना नहीं हुई, हमें उम्मीद है कि इस वर्ष के अंत तक यह सरकार डीजल को पूरी तरह विनियंत्रित कर देगी।" एक अधिकारी ने सूत्रों को बताया कि, "विनियंत्रण का समय वित्त मंत्री द्वारा राजनैतिक-आर्थिक माहौल को ध्यान में रखकर किया जाएगा।"
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डीजल पर विनियंत्रण का फैसला वर्ष 2013-14 में लिया गया था, जब सब्सिडी की रकम 62837 करोड़ रुपये तक पहुंच गयी थी। उम्मीद थी कि इस साल यह 19584 करोड़ रुपये तक लाने की योजना थी। यूपीए सरकार ने डीजल पर बढ़ रही सब्सिडी को कम करने का फैसला किया था। तत्कालीन सरकार ने हर महीने डीजल पर 50 पैसे बढ़ाने की योजना बनायी थी।
भारत सरकार ने पेट्रोल की कीमतें 2010 में विनियंत्रित की थीं। हालांकि सरकार ने डीजल के साथ ऐसा नहीं किया था। सरकार ने डीजल के दामों को कुछ हद तक ही विनियंत्रित किया था। हालांकि, सरकार अभी तक कीमत वृद्धि को नियंत्रित करती है। ईंधन का विनियंत्रण जरूरी है। इससे इस क्षेत्र में अधिक निजी निवेश आएगा।
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रिलायंस और एस्सार ने हाल ही में तेल क्षेत्र में प्रवेश किया था। वे केवल तीन वर्षों तक ही इस क्षेत्र में रहे। सरकारी क्षेत्र की तेल कंपनियों को कई रियासतें और फायदे दिये जाते थे और इस तरह निजी क्षेत्र की कंपनियां इसका मुकाबला नहीं कर पायीं। हालांकि, डीजल के विनियंत्रण के बाद इन कंपनियों की इस क्षेत्र में वापसी हो सकती है।


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