रईस बेफिक्र है सरकार के आदेश से, नहीं हटा रहें टिन्टेड ग्लास
आम आदमी भले ही सरकार या फिर माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद हिल जाता हो लेकिन रईशों पर इन बातों का कितना असर पड़ता है इसका जीता-जागता उदाहरण महानगरों में तेजी फर्राटा भर रही शाही कारें है। जी हां हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एक आदेश जारी किया था कि बीते 27 अप्रैल से कारों पर ब्लैक फिल्म यानी की टिन्टेड ग्लास का प्रयोग गैरकानूनी है। इसके लिए सरकार ने लोगों को लगभग एक महिने का समय भी दिया था।
उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद कुछ बड़े महानगरों में पुलिस तत्काल प्रभाव से एक्टीव हो गई और सड़क पर फर्राटा भर रही कारों को रोक कर उनसे ब्लैक फिल्म निकलवाने लगी। देश के आईटी हब कहे जाने वाले शहर बैंगलूरु में भी सरकार के इस आदेश का कड़ाई से अनुपालन करते देखा गया। मगर कुछ दिनों बाद ही न्यायालय का यह आदेश काफूर होता नजर आने लगा।
जी हां जो लोग उंची पहुंच और लंबे रसूख से मरहूम है उन लोगों ने अपने जेब कटने से पहले ही अपनी कारों से टिंटेड ग्लास हटाने शुरू कर दिये। यहां तक की सड़क के किनारे कुछ मकैनिकों ने 500 से 800 रुपये में ब्लैक फिल्मों को उतारने का धंधा भी शुरू कर दिया। लेकिन बावजूद इसके अभी भी देश भर में कई ऐसी कारें रोजाना सड़के नाप रहीं है जिन पर काले फिल्म चढ़े हुए है, और यह कारें किसी और की नहीं बल्कि देश के रईस और बुद्धजीवी वर्ग की कारें हैं।
सरकार क्यूं हटाना चाहती है काली फिल्में:
सरकार का वाहनों से काली फिल्में हटाने का एक खास मकसद अपराध पर अंकुश लगाना है। पुलिस भी इस बात को मानती है कि सड़क पर काली फिल्मों से सजी कारों के भीतर क्या हो रहा इस बात का अंदाजा लगाना बेहद मश्किल होता है। इसी का फायदा उठाकर आये दिन चलती कारों में गलत लोग अपराधों को अंजाम भी देतें हैं, साथ ही कई बार अपराधी खुद इन काली फिल्मों की आड़ में पुलिस के हाथों से बच निकलतें है।
खैर न्यायालय ने तो अपना आदेश जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली लेकिन क्या बड़ी-बड़ी गाडि़यों में फर्राटा भरने वाले अपनी जिम्मेदारियों को समझ रहें है। यह अभी भी एक प्रश्न बना हुआ है। सरकार ने काली फिल्म को वाहनों से हटाने के लिए कई बार आखीरी तारीख को बढ़ाया है लेकिन अभी भी सड़क पर कई कारें ऐसी है जो काली फिल्मों से सजी फर्राटा भर रहीं हैं।


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